ग्रंथवाल्मीकि रामायणसुन्दरकाण्डसर्ग 1414.45वाल्मीकि रामायण 14.45सा राम राम महिषी राघवस्य प्रिया सदा । वन सम्चार कुशला नूनम् एष्यति जानकी ॥५-१४-४५॥पिछलाअगलापूरा अध्याय