ग्रंथवाल्मीकि रामायणसुन्दरकाण्डसर्ग 1414.4वाल्मीकि रामायण 14.4अथ आम्र वण सम्चन्नाम् लता शत समावृताम् । ज्या मुक्त इव नाराचः पुप्लुवे वृक्ष वाटिकाम् ॥५-१४-४॥पिछलाअगलापूरा अध्याय