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वाल्मीकि रामायण 12.4

विरूप रूपा विकृता विवर्चसो ।
महा आनना दीर्घ विरूप दर्शनाः ।समीक्ष्य सा राक्षस राज योषितो ।भयाद् विनष्टा जनक ईश्वर आत्मजा ॥५-१२-४॥

पूरा अध्याय