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वाल्मीकि रामायण 1.65

कक्षान्तरगतो वायुर्जीमूत इव गर्जति ।
खे यथा निपतन्त्युल्का ह्युत्तरान्ताद्विनिःसृता ॥५-१-६५॥

पूरा अध्याय