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वाल्मीकि रामायण 1.147

राक्षसं रूपमास्थाय सुघोरं पर्वतोपमम् ।
दंष्ट्रकराLअं पिङ्गाक्षं वक्त्रं कृत्वा नभःसमम् ॥५-१-१४७॥

पूरा अध्याय