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वाल्मीकि रामायण 1.140

हिरण्यनाभ शैलेन्द्र परितुष्टोऽस्मि ते भृशम् ।
अभयं ते प्रयच्छामि तिष्ठ सौम्य यथासुखम् ॥५-१-१४०॥

पूरा अध्याय