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वाल्मीकि रामायण 1.117

तदिदं गन्धवत्स्वादु कन्दमूलफलं बहु ।
तदास्वाद्य हरिश्रेष्ठ विश्रान्तोऽनु गमिष्यसि ॥५-१-११७॥

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