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वाल्मीकि रामायण 1.107

आदित्यशतसंकाशः सोऽभवद्गिरिसत्तमः ।
तमुत्थितमसंगेन हनुमानग्रतः स्थितम् ॥५-१-१०७॥

पूरा अध्याय