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वाल्मीकि रामायण 67.24

निमेष अन्तर मात्रेण निरालंबनम् अंबरम् ।
सहसा निपतिष्यामि घनात् विद्युत् इव उत्थिता ॥४-६७-२४॥

पूरा अध्याय