Utshovऐप डाउनलोड करें

वाल्मीकि रामायण 67.14

पन्नग अशनम् आकाशे पतन्तम् पक्षि सेवितम् ।
वैनतेयम् अहम् शक्तः परिगंतुम् सहस्रशः ॥४-६७-१४॥

पूरा अध्याय