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वाल्मीकि रामायण 63.15

अथ पवन समान विक्रमाःप्लवग वराः प्रतिलब्ध पौरुषाः ।
अभिजित् अभिमुखाम् दिशम् ययुःजनक सुता परिमार्गण उन्मुखाः ॥४-६३-१५॥

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