ग्रंथवाल्मीकि रामायणकिष्किन्धाकाण्डसर्ग 5353.5वाल्मीकि रामायण 53.5ते वसंतम् अनुप्राप्तम् प्रतिवेद्य परस्परम् । नष्ट संदेश काल अर्था निपेतुर् धरणी तले ॥४-५३-५॥पिछलाअगलापूरा अध्याय