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वाल्मीकि रामायण 48.6

स तु देशो दुर्अन्वेषो गुहा गहनवान् महान् ।
निर्जलम् निर्जनम् शून्यम् गहनम् घोर दर्शनम् ॥४-४८-६॥

पूरा अध्याय