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वाल्मीकि रामायण 46.7

अथ अहम् गत बुद्धिः तु सुव्यक्तम् निहतो गुरुः ।
शिला पर्वत संकाशा बिल द्वारि मया कृता ॥४-४६-७॥

पूरा अध्याय