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वाल्मीकि रामायण 46.15

उदयम् तत्र पश्यामि पर्वतम् धातु मण्डितम् ।
क्षीरोदम् सागरम् चैव नित्यम् अप्सर आलयम् ॥४-४६-१५॥

पूरा अध्याय