ग्रंथवाल्मीकि रामायणकिष्किन्धाकाण्डसर्ग 4444.11वाल्मीकि रामायण 44.11तम् समीक्ष्य महातेजा व्यवसायोत्तरम् हरिम् । कृतार्थ इव संहृष्टः प्रहृष्ट इन्द्रिय मानसः ॥४-४४-११॥पिछलाअगलापूरा अध्याय