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वाल्मीकि रामायण 42.44

शृंगे तस्य महत् दिव्यम् भवनम् सूर्य संनिभम् ।
प्रासाद गण संबाधम् विहितम् विश्वकर्मणा ॥४-४२-४४॥

पूरा अध्याय