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वाल्मीकि रामायण 42.33

तम् अतिक्रम्य शैलेन्द्रम् कांचनान् अन्तर दर्शनम् ।
पर्वतः सर्व सौवर्णो धारा प्रस्रवण आयुतः ॥४-४२-३३॥

पूरा अध्याय