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वाल्मीकि रामायण 40.57

तत्र योजन विस्तारम् उच्छ्रितम् दश योजनम् ।
शृंगम् सौमनसम् नाम जातरूपमयम् ध्रुवम् ॥४-४०-५७॥

पूरा अध्याय