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वाल्मीकि रामायण 38.34

ततः समुद्योगम् अवेक्ष्य वीर्यवान्हरि प्रवीरस्य निदेश वर्तिनः ।
बभूव हर्षात् वसुधा अधिप आत्मजःप्रबुद्ध नील उत्पल तुल्य दर्शनः ॥४-३८-३४॥

पूरा अध्याय