ग्रंथवाल्मीकि रामायणकिष्किन्धाकाण्डसर्ग 3333.48वाल्मीकि रामायण 33.48मित्रम् हि अर्थ गुण श्रेष्ठम् सत्य धर्म परायणम् । तत् द्वयम् तु परित्यक्तम् न तु धर्मे व्यवस्थितम् ॥४-३३-४८॥पिछलाअगलापूरा अध्याय