ग्रंथवाल्मीकि रामायणकिष्किन्धाकाण्डसर्ग 3333.21वाल्मीकि रामायण 33.21प्रविशन् एव सततम् शुश्राव मधुर स्वनम् । तंत्री गीत समाकीर्णम् सम ताल पदाक्षरम् ॥४-३३-२१॥पिछलाअगलापूरा अध्याय