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वाल्मीकि रामायण 32.11

राघवेण तु वीरेण भयम् उत्सृज्य दूरतः ।
त्वत् प्रिय अर्थम् हतो वाली शक्र तुल्य पराक्रमः ॥४-३२-११॥

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