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वाल्मीकि रामायण 28.47

घन उपगूढम् गगनम् न तारान भास्करो दर्शनम् अभ्युपैति ।
नवैः जल ओघैः धरणी वितृप्तातमो विलिप्ता न दिशः प्रकाशाः ॥४-२८-४७॥

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