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वाल्मीकि रामायण 24.27

सा विस्फुरंती परिरभ्यमाणा भर्तुः समीपात् अपनीयमाना ।
ददर्श रामम् शर चाप पाणिम् स्व तेजसा सूर्यम् इव ज्वलंतम् ॥४-२४-२७॥

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