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वाल्मीकि रामायण 23.16

यस्य राम विमुक्तेन हृतम् एक इषुणा भयम् ।
शरेण हृदि लग्नेन गात्र संस्पर्शने तव ॥४-२३-१६॥

पूरा अध्याय