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वाल्मीकि रामायण 21.7

यद् अयम् न्याय दृष्ट अर्थः साम दान क्षमा परः ।
गतो धर्म जिताम् भूमिम् न एनम् शोचितुम् अर्हसि ॥४-२१-७॥

पूरा अध्याय