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वाल्मीकि रामायण 21.16

न हि मम हरि राज संश्रयात्क्षमतरम् अस्ति परत्र च इह वा ।
अभिमुख हत वीर सेवितम्शयनम् इदम् मम सेवितुम् क्षमम् ॥४-२१-१६॥

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