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वाल्मीकि रामायण 2.3

नैव चक्रे मनः स्थातुम् वीक्षमाणो महाबलौ ।
कपेः परम भीतस्य चित्तम् व्यवससाद ह ॥४-२-३॥

पूरा अध्याय