ग्रंथवाल्मीकि रामायणकिष्किन्धाकाण्डसर्ग 1818.21वाल्मीकि रामायण 18.21न हि लोक विरुद्धस्य लोक वृत्तात् अपेयुषः । दण्डात् अन्यत्र पश्यामि निग्रहम् हरि यूथप ॥४-१८-२१॥पिछलाअगलापूरा अध्याय