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वाल्मीकि रामायण 16.37

इन्द्र ध्वज इव उद्धूत पौर्ण मास्याम् महीतले ।
अश्वयुक् समये मासि गत सत्त्वो विचेतनः ।बाष्प संरुद्ध कण्ठस्तु वाली च आर्त स्वरः शनैः ॥४-१६-३७॥

पूरा अध्याय