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वाल्मीकि रामायण 15.6

तम् तु तारा परिष्वज्य स्नेहाद् दर्शित सौहृदा ।
उवाच त्रस्त संभ्रांता हित उदर्कम् इदम् वचः ॥४-१५-६॥

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