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वाल्मीकि रामायण 15.26

तत्र वा सन्निहस्थो वा सर्वथा बन्धुः एव ते ।
नहि तेन समम् बन्धुम् भुवि पश्यामि किंचन ॥४-१५-२६॥

पूरा अध्याय