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वाल्मीकि रामायण 13.24

एते वृक्षाः प्रकाशन्ते धूम संसक्त मस्तकाः ।
मेघ जाल प्रतिच्छन्ना वैदूर्य गिरयो यथा ॥४-१३-२४॥

पूरा अध्याय