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वाल्मीकि रामायण 1.86

वाति न एक रस आस्वाद सम्मोदित इव अनिलः ।
केचित् पर्याप्त कुसुमाः पादपा मधु गन्धिनः ॥४-१-८६॥

पूरा अध्याय