ग्रंथवाल्मीकि रामायणकिष्किन्धाकाण्डसर्ग 11.7वाल्मीकि रामायण 1.7नलिनैः अपि संछन्ना हि अत्यर्थ शुभ दर्शना । सर्प व्याल अनुचरिता मृग द्विज समाकुला ॥४-१-७॥पिछलाअगलापूरा अध्याय