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वाल्मीकि रामायण 1.127

तम् मत्त मातङ्ग विलास गामी गच्छन्तम् अव्यग्र मनाः महात्मा ।
स लक्ष्मणो राघवम् अप्रमत्तो ररक्ष धर्मेण बलेन च एव ॥४-१-१२७॥

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