ग्रंथवाल्मीकि रामायणअरण्यकाण्डसर्ग 6464.72वाल्मीकि रामायण 64.72इति उक्त्वा क्रोध ताम्र अक्षः स्फुरमाण ओष्ट संपुटः । वल्कल अजिनम् आबद्ध्य जटा भारम् बन्धयत् ॥३-६४-७२॥पिछलाअगलापूरा अध्याय