ग्रंथवाल्मीकि रामायणअरण्यकाण्डसर्ग 6464.45वाल्मीकि रामायण 64.45विशीर्णम् पतितम् भूमौ कवचम् कस्य कांचनम् । छत्रम् शत शलाकम् च दिव्य माल्य उपशोभितम् ॥३-६४-४५॥पिछलाअगलापूरा अध्याय