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वाल्मीकि रामायण 63.9

तत् श्लक्ष्ण सु व्यक्त मृदु प्रलापम्तस्या मुखम् कुंचित केश भारम् ।
रक्षो वशम् नूनम् उपगतायान भ्राजते राहु मुखे यथा इंदुः ॥३-६३-९॥

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