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वाल्मीकि रामायण 61.15

प्रिय कानन संचारा वन उन्मत्ता च मैथिली ।
सा वनम् वा प्रविष्टा स्यात् नलिनीम् वा सुपुष्पिताम् ॥३-६१-१५॥

पूरा अध्याय