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वाल्मीकि रामायण 55.18

साधु किम् ते अन्यया बुद्ध्या रोचयस्व वचो मम ।
भजस्व मा अभितप्तस्य प्रसादम् कर्तुम् अर्हसि ॥३-५५-१८॥

पूरा अध्याय