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वाल्मीकि रामायण 53.23

क्व गतो लप्स्यसे शर्म भर्तुः मम महात्मनः ।
निमेष अन्तर मात्रेण विना भ्रातरम् आहवे ॥३-५३-२३॥

पूरा अध्याय