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वाल्मीकि रामायण 52.5

त्राहि माम् अद्य काकुत्स्थ लक्ष्मण इति वरांगना ।
सु संत्रस्ता समाक्रंदत् शृण्वताम् तु यथा अन्तिके ॥३-५२-५॥

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