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वाल्मीकि रामायण 52.21

रुदितम् व्यपमृष्ट अस्रम् चन्द्रवत् प्रिय दर्शनम् ।
सु नासम् चारु ताम्र ओष्ठम् आकाषे हाटक प्रभम् ॥३-५२-२१॥

पूरा अध्याय