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वाल्मीकि रामायण 51.9

स राक्षस रथे पश्यन् जानकीम् बाष्प लोचनाम् ।
अचिंतयित्वा बाणाम् तान् राक्षसम् समभिद्रवत् ॥३-५१-९॥

पूरा अध्याय