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वाल्मीकि रामायण 44.14

संधाय सुदृढे चापे विकृष्य बलवत् बली ।
तम् एव मृगम् उद्दिश्य श्वसंतम् इव पन्नगम् ॥३-४४-१४॥

पूरा अध्याय