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वाल्मीकि रामायण 40.2

तम् पथ्य हित वक्तारम् मारीचम् राक्षसाधिपः ।
अब्रवीत् परुषम् वाक्यम् अयुक्तम् काल चोदितः ॥३-४०-२॥

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