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वाल्मीकि रामायण 4.6

सः भग्न बहुः संविग्नः पपात आशु विमूर्छितः ।
धरण्याम् मेघ संकाशो वज्र भिन्न इव अचलः ॥३-४-६॥

पूरा अध्याय