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वाल्मीकि रामायण 4.28

तम् मुक्त कण्ठम् उत्क्षिप्य शङ्कु कर्णम् महास्वनम् ।
विराधम् प्राक्षिपत् श्वभ्रे नदन्तम् भैरव स्वनम् ॥३-४-२८॥

पूरा अध्याय